युवा दिलों की धड़कन, जन जागृति का दर्पण, निष्पक्ष एवं निर्भिक समाचार पत्र

29 सितंबर 2011

अदालत ने डेरा पर दिया ऐतिहासिक फैसला



डबवाली (लहू की लौ) अतिरिक्त सिविल जर्ज (वरिष्ठ मण्डल) डॉ. अतुल मडिया की अदालत ने मंगलवार को गांव बनवाला के गीता भवन के संचालन के संबंध में एक एतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसके संचालन का अधिकार वादी चिमन लाल उर्फ चिमन प्रकाश को सौंपने के आदेश वर्तमान संचालकों को दिए।
27-9-2006 को चिमन लाल पुत्र रामरक्ख पुत्र अर्जुन चेला, रामप्रताप उर्फ रमप्रकाश पुत्र रामरक्ख पुत्र अर्जुन (चेला बसंत दास) निवासी बनवाला ने अदालत में एक वाद दायर करते हुए कहा कि वह रामप्रताप उर्फ रामप्रकाश पुत्र रामरक्खा निवासी रामपुरा बिश्नोईयां का असल भाई था। रामप्रताप उर्फ रामप्रकाश अविवाहित था। साल 1970 में साधु बन गया और गांव पन्नीवाला रूलदू जिला सिरसा के संत बसंत दास की सेवा करने लगा। संत बसंत दास का बड़ा डेरा वही संभाला करता था। डेरा में रहते हुए उसका भाई रामप्रताप देसी दवाई दिया करता था। जिसके चलते वह संत और वैद्य के नाम से क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गया। संत बसंत दास ने रामप्रताप उर्फ रामप्रकाश को उसकी सेवा देखते हुए उसे अपना चेला बना लिया। लेकिन गांव बनवाला के लोग रामप्रकाश को गांव बनवाला में ले गए। रामप्रताप ने गांव वासियों के अनुरोध पर 1980 में लोगों की भलाई के लिए वहां रहना शुरू कर दिया। गांव बनवाला की पंचायत ने 43 कैनाल 16 मरले भूमि रामप्रकाश को गीता भवन बनाने के लिए दी। लेकिन रामप्रकाश ने इस भूमि में से 10 कैनाल भूमि पर गीता भवन का निर्माण कार्य शुरू कर दिया। गीता भवन पर रामप्रकाश ने देसी दवाईयों से प्राप्त आय को खर्च किया।
चिमन प्रकाश के अनुसार वह भी अविवाहित था। रामप्रकाश ने उससे कहा कि वह संत बन जाए और बिना स्वार्थ और बिना भेदभाव के लोगों की सहायता करे। जिस पर 1981 में संत रामप्रकाश ने उसे अपना चेला बना लिया और वह उसके साथ गांव बनवाला के डेरा में रहकर सेवा व संभाल करने लगा। 29 अप्रैल 2006 को संत रामप्रकाश की मौत हो गई। इसके बाद कुछ लोगों ने 29 मई 2006 को मुन्ना पुत्र ओमप्रकाश निवासी हम्मुसर (तहसील रतनगढ़) जिला चुरू हाल आबाद गीता भवन निवासी पन्नीवाला, अमरो पुत्री करतार सिंह निवासी लोको तहसील व जिला मोगा हाल आबाद गीता भवन, गांव बनवाला तहसील डबवाली, आनंद सिंह पुत्र सज्जन सिंह निवासी ओटू (रानियां) सिरसा को गीता भवन का संचालन संभाल दिया। जबकि ये लोग कभी भी संत रामप्रकाश के चेले नहीं थे और न ही उसकी सेवा व संभाल करते थे।
अदालत से वादी ने गुहार लगाई कि रामप्रकाश की अस्टीम कार, ट्रेक्टर और बीस बोर बंदूक का वारिस है और साथ में गीता भवन के संचालन तथा डेरा के संचालन का हकदार है। उसे उसका हक दिलाया जाए। अदालत के समक्ष वादी ने अपने सभी सबूत भी प्रस्तुत किए।
अदालत में मुन्ना ने स्वीकार किया कि संत रामप्रकाश को मुखाग्नि चिमन प्रकाश ने दी थी और वही उसकी सेवा करता था। 29-5-2006 को गांव की पंचायत ने उसे गीता भवन और डेरा का संचालन का कार्य सौंप दिया।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क-वितर्क सुनने के बाद निर्णय सुनाया कि रामप्रकाश का वारिस चिमन प्रकाश है और अस्टीम कार, बीस बोर की बंदूक का मालिक भी वह है तथा गीता भवन और डेरा के संचालन का हकदार भी है। अदालत ने प्रतिवादियों को आदेश दिए कि तीन माह के भीतर गीता भवन और डेरा का संचालन वादी चिमन प्रकाश को सौंप दे।
इस मामले में 37 पृष्ठों का एतिहासिक फैसला सुनाते हुए डॉ. अतुल मडिया, अतिरिक्त सिविज जज (वरिष्ठ मण्डल) की अदालत ने हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तक श्री मद्भागवत गीता के अध्याय 18 के श्लोक नं. 2 का उल्लेख करते हुए सन्यास के बारे में कहा कि ईष्ट की प्राप्ति और निष्ट की निवृत्ति के लिए जो कर्म किए जाते हैं, उनके त्याग करने का नाम सन्यास है। फल न चाहकर कत्र्तव्य-कर्मो को करते रहने का नाम त्याग है। इस सन्यास धर्म की पालना के कारण चिमन प्रकाश अपने गुरू संत रामप्रकाश का वारिस है।

कोई टिप्पणी नहीं: