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06 जनवरी 2010

कला को बंदूकों से नहीं दबा सकते जेहादी-धालीवाल

डबवाली (लहू की लौ) कला कुदरत की तरह स्वतन्त्र है। वह न किसी देश, न किसी सीमा, न किसी धर्म, न किसी भाषा और न ही किसी जाति विशेष से बंधी होती है। बल्कि कला तो सबके लिए और सबको अच्छा संदेश देने के लिए होती है।
यह शब्द एक कलाकार के हैं जिसका नाम है केवल धालीवाल और जिसने कथा कश्मीर नाटक के माध्यम से कला के स्वरूप को संसार के सामने रखा है। कथा कश्मीर के माध्यम से कलाकार ने यह बताने का प्रयास किया है कि भले ही कश्मीर में जेहादी मौत का साया बनकर धर्म के नाम पर मासूमों का खून बहा रहे हैं और पुरातन कला को मिटाने के लिए बंदूक की गोलियों से कला को कत्ल करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद भी कला को वे किसी प्रकार से नहीं दबा सकेंगे। क्योंकि कला भी एक जुनून है। जो कलाकार के माध्यम से संसार को शांति, भाईचारे और अपने अधिकारों की रक्षा का संदेश देते हुए अन्त में आतंक पर विजय प्राप्त करेगी।
इस संवाददाता से बातचीत करते हुए केवल धालीवाल ने बताया कि उसने अपनी अभिव्यक्ति को आवाज देने के लिए मंच-रंगमंच के नाम से अमृतसर में एक पहल की है। कथा कश्मीर का डबवाली में उसकी 10वीं प्रस्तुति है। वह अब तक सात वर्षों में अनेक देशों में घूम चुका है और वह इस मुकाम पर पहुंचा है कि रंगमंच एक ऐसा अभिव्यक्ति का साधन है, जो समाज को मार्गदर्शन दे सकता है। विशेषकर देश में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज को बुलन्द करके उसको समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
उन्होंने कहा कि कलाकार अपनी कला के माध्यम से समाज को बहुत कुछ देना चाहता है, लेकिन कलाकार की मजबूरियों के चलते कई बार सरकारें उसके मार्ग में बाधा बन जाती हैं। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि रंगमंच के कलाकारों को एकजुट होकर सरकारों की बैसाखियों को छोड़कर अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी कला के लिए कुछ करना होगा। उनका मानना है कि सरकारें तो सहयोग के नाम पर केवल कलाकारों के जख्म ही कुरेद सकती हैं और उसे आगे बढऩे का मौका नहीं दे सकती, इसके लिए तो कलाकार को अपने में ही आगे बढऩे, देश और समाज की सेवा का जुनून भरना होगा।
धालीवाल ने पंजाब सरकार को कोसते हुए कहा कि अब तक पंजाब में जितनी भी सरकारें आई हैं, इन सरकारों ने राज्य में कला को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रंगमंचों का एक भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया। जबकि कला को प्रोत्साहित करने के नाम पर नेता लोग जमकर ढि़ंढोरा पीटते हैं।