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13 जनवरी 2011

मोहल्ले से परिवार तक सिमटा लोहड़ी पर्व

डबवाली (लहू की लौ) लोहड़ी के पवित्र त्यौहार की समय के साथ परम्परा लुप्त होती जा रही है। कभी यह त्यौहार वार्ड का सांझा त्यौहार होता था लेकिन समय के साथ यह त्यौहार पारिवारिक त्यौहार में सिमटता जा रहा है। लोगों के सुख—दु:ख को सांझा करने वाला यह त्यौहार केवल अहम् का त्यौहार बनता जा रहा है।
करीब 8 वर्ष पूर्व लोहड़ी के त्यौहार पर मुहल्ले के सभी लोग इक्_े हो जाते और सांझे तौर पर एक स्थान पर लकड़ी तथा उपलों को जला कर लोहड़ी मनाते। इस अवसर पर सभी लोग मूंगफली, तिल, रेवड़ी, गुड़ अग्नि में डालते। यह लोहड़ी 15-15 फुट तक होती और दूर-दूर तक बैठे लोगों को सर्दी से राहत दिलाती। यहीं बल्कि लोहड़ी को एक दवा के रूप में भी पूजा जाता था। मूली लेकर उस पर तिल लगा कर सात बार लोहड़ी के ऊपर से मूली को घुमा दिया जाता और अगले दिन सुबह खाली पेट इस मूली को खाया जाता। इस संबंध में किदवंति प्रचलित थी कि इस मूली को खाने वाले का सिरदर्द नहीं होता और एक साल बार तक सांप भी नहीं डंसता।
यह शब्द किसी और के नहीं बल्कि अपने जीवन के 8 दशक पूरे कर चुकी वृद्धा दर्शना देवी पत्नी अमर पाल सचदेवा के हैं। उनके अनुसार वह पिछले 80 वर्षों से लोहड़ी का पर्व देखती आ रही है। लेकिन समय के साथ लोहड़ी के प्रति लोगों के रूझान में आ रही कमी उसे खलती है। वह भी जमाना था जब लोहड़ी के पास बैठ कर महिला और पुरूष केवल गीत ही नहीं गाते थे बल्कि एक-दूसरे के सुख—दु:ख की बातें करके उनका समाधान भी ढूंढ़ते थे। लेकिन युग के साथ त्यौहार भी बदल गया है। मुहल्ले का त्यौहार पहले गली में सिमटा और अब परिवार में सिमट गया है। अहम् और स्वार्थ के चलते लोग सांझा त्यौहार मनाने की अपेक्षा अपने ही घरों के आगे लोहड़ी लगाने तक सीमित हो गये हैं।
रमेश सचदेवा ज्योतिषी ने बताया कि लोहड़ी पर बैठ कर खूब मस्ती करते, गुब्बारे उड़ाते, पटाखे छोड़ते। उनके अनुसार जिस घर में नई शादी हुई होती और पुत्र का जन्म हुआ होता तो वह परिवार सभी के लिए लोहड़ी बांटता। शाम को 7 बजे लोहड़ी डालते और रात के 2 बजे तक लोहड़ी जलती रहती और वह भी बैठे रहते। अब तो लोहड़ी, लोहड़ी न रह कर कई बार नशेडिय़ों के झगड़े का कारण बन जाती है। लोग शराब पीकर लोहड़ी मनाते हैं, फिर लोहड़ी मना रहे लोगों से उलझते हैं। सुख का यह त्यौहार झगड़े के कारण समस्याओं का त्यौहार बन जाता है।
हलवाई यूनियन के प्रधान मदन लाल सेठी के अनुसार लोहड़ी का पर्व ऋतुओं के बदलाव के साथ बंधा हुआ त्यौहार है जो इस बात का संदेश देता है कि अब सर्दी जा रही है और आग सेंकने का मौसम भी जा रहा है। उनके अनुसार लोहड़ी का पर्व खुशहाली से जुड़ा हुआ है इसलिए लोहड़ी में काले तिल डालते समय ईसर आ, दरिद्र जा, दरिद्र की जड़ चूल्हे पा कहा जाता है।

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