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25 जून 2011

अलविदा अंग्रेजी सिस्टम


डबवाली रेलवे प्लेटफार्म पर अब नहीं जलाया जाएगा अंग्रेजों का दीया, कलर लाईट सिस्टम होगा शुरू
डबवाली। भारत से अंग्रेजों को गए करीब 64 साल बीत गए हैं। इतना लम्बा समय बीतने के बाद आज भी देश उनकी दी हुई व्यवस्था पर निर्भर होकर आगे बढ़ता रहा है। लेकिन अब भारतीय रेल ने रेलवे में 'ब्रिटिश साम्राज्यÓ के प्रतीकों को खत्म करने की 'क्रांतिÓ छेड़ी हुई है। भारतीय रेल में अंग्रेजी सिस्टम को खत्म कर भारतीय और आधुनिक सिस्टम स्थापित किया जा रहा है।
देश में रेल व्यवस्था अंग्रेजों ने स्थापित की। अभी तक यही व्यवस्था चल रही है। प्लेटफार्म पर आ रही गाड़ी को रेड या ग्रीन सिग्नल देने के लिए केरोसीन का दीया जलाया जाता था। गाड़ी क्रॉस कराने के लिए लाईन क्लीरेंस जानना जरूरी था। इसके लिए टोकन सिस्टम भी लागू किया गया। जिससे कर्मचारियों को गाड़ी को प्लेटफार्म से निकालते-निकालते करीब 15 मिनट बेकार हो जाते थे। इतनी देर तक फाटक डाऊन रहता। यहीं नहीं गाड़ी मात्र 50 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ती। लेकिन अब भारतीय रेल महकमे ने दीये के सिग्नल से छुटकारा पाने के लिए कलर लाईट सिस्टम शुरू किया है। यह सिस्टम बठिंडा केबिन ए, बी से लेकर डबवाली, गांव बडिंगखेड़ा प्लेटफार्म तक स्थापित किया जा रहा है।
क्या होगा फायदा
स्टेशन मास्टर महेश सरीन ने बताया कि कलर लाईट सिस्टम से पूर्व लैम्प (दीया) सिस्टम लागू था और यह कार्य भी मैनूअल था। लेकिन अब यह सिस्टम हो जाने से स्टेशन मास्टर को उनके कार्यक्षेत्र में गाड़ी के प्रवेश करते ही जानकारी मिल जाएगी। स्टेशन मास्टर तुरंत गाड़ी को सुरक्षित लाईन पर डाल देगा। इस व्यवस्था से गाड़ी 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ेगी। लाईन क्लीरिंग में यहां करीब पंद्रह मिनट का समय लगता, वहीं अब मात्र तीन मिनट में प्लेटफार्म पर आई गाडिय़ों को उनके गंतव्य की ओर रवाना किया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि कलर लाईट सिस्टम में रेलवे फाटक बंद होते एक तेज ध्वनि करेगा, ताकि लोगों को मालूम पड़ सके कि फाटक बंद हो रहा है।
सिस्टम को स्थापित कर रही एचबीएल पॉवर सिस्टमस लि. कंपनी के साईट मैनेजर जगजीत सिंह ने बताया कि रेलवे ने तीन करोड़ रूपए में कंपनी को बठिंडा-बीकानेर लाईन पर पड़ते रेलवे स्टेशन पर कलर लाईट सिस्टम स्थापित करने का ठेका दिया है। उनके अनुसार बठिंडा कैबिन ए, बी, गुरूसर सेहनेवाला, संगत, बगवाली, डबवाली तथा बडिंगखेड़ा में यह सिस्टम स्थापित होने में करीब छह माह लग जाएंगे।

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