सिरसा, 28 अक्टूबर।
हरियाणा की लवणता प्रभावित भूमि को आर्थिक अवसर में बदलने तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए तकनीक आधारित झींगा पालन की संभावनाओं पर चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय में कार्यशाला एवं पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) ने कोटक महिंद्रा बैंक की सीएसआर पहल ‘कोटक कर्मा’ और सीडीएलयू के सहयोग से विश्वविद्यालय के सीवी रमन सेमिनार हॉल में ‘एआई और इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित लवणीय झींगा पालन का विस्तार’ विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया।
कार्यशाला में आईसीआरआईईआर की ओर से तैयार नीति शोध-पत्र ‘तालाब से डिजिटल मंच तक सिरसा, हरियाणा में एआई और इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित झींगा पालन की आवश्यकता’ का विमोचन किया गया। आईसीआरआईईआर की फेलो डॉ. राया दास ने शोध-पत्र की प्रमुख जानकारियां प्रस्तुत कीं। शोध-पत्र के अनुसार, सिरसा की लवणता प्रभावित भूमि पर व्यावसायिक रूप से लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल झींगा पालन को बढ़ावा देने में आधुनिक तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
शोध-पत्र में बताया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) पर आधारित उपकरण किसानों को झींगा पालन में चारे का बेहतर उपयोग करने, उत्पादन संबंधी जोखिमों को कम करने और निर्यात बाजारों की उत्पाद अनुरेखण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद कर सकते हैं।
आईसीआरआईईआर के विशिष्ट प्रोफेसर डॉ. अशोक गुलाटी ने कहा कि झींगा पालन को सफल बनाने के लिए स्पष्ट नीतिगत दृष्टिकोण, बेहतर उत्पाद, आधुनिक कार्यप्रणालियों और मजबूत साझेदारी की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि किसान एआई और इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित तकनीक अपनाते हैं तो चारे में कितनी बचत होगी, यह उत्पाद नवाचार से तय होता है। साथ ही जोखिम को कैसे कवर किया जाए और किसान कौन-सी कार्यप्रणालियां अपनाएं, यह भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए हमेशा साझेदारियों की आवश्यकता होती है।
भारत सरकार के मत्स्यपालन विभाग के पूर्व सचिव डॉ. तरुण श्रीधर ने अपने मुख्य वक्तव्य में खाद्य सुरक्षा से आगे बढक़र पोषण सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गेहूं और चावल पेट भर सकते हैं और कैलोरी दे सकते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण पोषण नहीं दे सकते। अब देश खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर बढ़ रहा है, और पोषण सुरक्षा का सबसे बड़ा तत्व प्रोटीन है। देश को कुपोषण और अल्पपोषण की समस्या से निपटने के लिए पोषण सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लोगों को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण पोषण उपलब्ध करवाना जरूरी है।
मत्स्यपालन विभाग के पूर्व संयुक्त सचिव सागर मेहरा ने कहा कि सिरसा में झींगा पालन के लिए ऐसा मॉडल विकसित करने की जरूरत है, जो बड़े स्तर पर अपनाया जा सके, व्यावसायिक रूप से लाभकारी हो और पर्यावरण के अनुकूल भी रहे। उन्होंने कहा कि इस दिशा में केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विज्ञान, तकनीक, वित्तीय सहायता और बाजार को एक-दूसरे से जोडऩे वाली समन्वित व्यवस्था विकसित करनी होगी। उद्घाटन सत्र को सिरसा के अतिरिक्त उपायुक्त एवं जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अर्पित संगल ने भी संबोधित किया।
सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के डॉ. केएन राघवन, आईसीएआर-सीआईएफई रोहतक के वैज्ञानिकों तथा आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज और बायोएडैप्टिस स्टार्टअप के प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे। दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ. अशोक गुलाटी ने की। इस सत्र में एआई और इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाने, वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाने और संस्थागत सहयोग मजबूत करने पर विचार-विमर्श किया गया। हरियाणा मत्स्य पालन विभाग, नाबार्ड, कोटक महिंद्रा बैंक, एक्सपर्ट स्किल डेवलपमेंट और एक्वाएक्सचेंज के प्रतिनिधियों ने किसान उत्पादक संगठनों, शीत भंडारण सुविधाओं, ऋण उपलब्धता और भूमि पट्टे से जुड़े विषयों पर चर्चा की। कार्यशाला में किसानों के बीच किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्ष भी साझा किए गए। डॉ. अशोक गुलाटी ने समापन वक्तव्य दिया, जबकि सीडीएलयू के प्राणीशास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. एचके कंबोज ने धन्यवाद सम्बोधन दिया।
गौरतलब है कि इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) एक स्वतंत्र सार्वजनिक नीति अनुसंधान संस्थान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1981 में हुई थी।

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