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Lahoo Ki Lau
04 अक्टूबर 2026
5 एकड़ में 62 किस्म की सब्जियां उगाकर मत्तड़ के किसान ने बदली खेती की तस्वीर
धान-गेहूं से हटकर अपनाई विविध खेती, विदेशी सब्जियों से बढ़ी आमदनी और घटा पानी का खर्च
सिरसा, 03 अक्टूबर।
खेती में प्रयोग और बाजार की मांग की समझ हो तो छोटी जोत भी बेहतर आमदनी का आधार बन सकती है। गांव मत्तड़ के प्रगतिशील किसान गुरप्रीत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह ने पांच एकड़ में एक साथ अलग-अलग मौसम की करीब 62 किस्म की सब्जियां उगाकर इसका उदाहरण प्रस्तुत किया है। परंपरागत धान-गेहूं की खेती से हटकर उन्होंने बागवानी आधारित विविध खेती को अपनाया और खेत को पूरे वर्ष उत्पादन देने वाली इकाई में बदल दिया। अब वे विदेशी एवं विशेष किस्म की सब्जियों की खेती कर रहे हैं और अपनी उपज चंडीगढ़, दिल्ली व लुधियाना की सब्जी मंडियों तक पहुंचा रहे हैं। किसान के अनुसार उन्हें सालाना प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये से अधिक की बचत हो रही है। गुरप्रीत सिंह ने अपनी पांच एकड़ जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग सब्जियों की खेती शुरू की। उनके खेत में लीक, सेलेरी, चेरी टमाटर, रंग-बिरंगी गोभी, घेरकिन खीरा और रंगीन शिमला मिर्च जैसी सब्जियां उगाई जा रही हैं। अलग-अलग फसलों की बुवाई और तुड़ाई का समय अलग होने से खेत में पूरे साल उत्पादन का सिलसिला बना रहता है।
15 से 20 दिन के अंतराल पर नई बुवाई
किसान के अनुसार एक ही समय पर पूरी जमीन में एक फसल लगाने के बजाय वे चरणबद्ध तरीके से खेती करते हैं। करीब 15 से 20 दिन के अंतराल पर नई बुवाई करने से अलग-अलग समय पर फसल तैयार होती रहती है। इससे बाजार में लगातार सब्जी भेजने का अवसर मिलता है और किसी एक फसल पर निर्भरता भी कम होती है। गुरप्रीत सिंह ने बताया कि विदेशी और विशेष किस्म की सब्जियों की मांग सामान्य सब्जियों से अलग बाजार में है। उनके अनुसार चेरी टमाटर को होटल और कंपनियों तक पहुंचाने पर बेहतर भाव मिलता है। रंगीन गोभी और घेरकिन खीरे की भी विशेष मांग रहती है। उनका कहना है कि फसल लगाने से पहले बाजार तलाशना और खरीदार से संपर्क करना इस खेती में बेहद जरूरी है।
पांच एकड़ से 10 से 12 लाख रुपये शुद्ध आमदनी का दावा
गुरप्रीत सिंह के अनुसार पहले पांच एकड़ में धान-गेहूं की खेती से सालभर में करीब दो से ढाई लाख रुपये की बचत होती थी। विविध सब्जी उत्पादन अपनाने के बाद उनका दावा है कि सभी खर्च निकालने के पश्चात 10 से 12 लाख रुपये सालाना शुद्ध मुनाफा हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इस खेती में पानी की खपत परंपरागत खेती की तुलना में करीब 70 प्रतिशत तक कम हुई है।
पहले बाजार, फिर बीज का करें चयन
किसान गुरप्रीत सिंह का कहना है कि नई तरह की खेती शुरू करने वाले किसानों को एकदम बड़े स्तर पर जोखिम लेने के बजाय पहले एक कनाल या छोटे क्षेत्र में प्रयोग करना चाहिए। बाजार में किस सब्जी की मांग है, खरीदार कौन है और किस समय बेहतर भाव मिल सकता है, इसकी जानकारी लेने के बाद ही बीज और फसल का चयन करना चाहिए। उनके अनुसार कंपनियों, होटलों और सीधे खरीदारों से संपर्क होने पर किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार मिल सकता है। मत्तड़ के इस किसान का प्रयोग यह संदेश देता है कि खेती में फसल विविधीकरण, बाजार की समझ और चरणबद्ध उत्पादन को अपनाकर छोटी जोत को भी सालभर आय देने वाले मॉडल में बदला जा सकता है।
03 अक्टूबर 2026
पारंपरिक खेती से हटकर झींगा पालन ने बदली कैलाश की राह
- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत आठ लाख के सहयोग से शुरू किया झींगा पालन
- 8.5 टन वार्षिक उत्पादन के साथ 14 लोगों को मिला रोजगारसिरसा, 02 अक्टूबर।
जिले के गांव कर्मसाना की महिला किसान कैलाश ने पारंपरिक कृषि फसलों से हटकर झींगा पालन को अपनाकर अपनी आय का नया और वैकल्पिक साधन विकसित किया है। वर्ष 2022 में मत्स्य विभाग के मार्गदर्शन एवं सहयोग से उन्होंने झींगा पालन की शुरुआत की। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मिली वित्तीय सहायता और तकनीकी प्रशिक्षण ने उनके इस प्रयास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कैलाश ने झींगा पालन इकाई स्थापित करने के लिए करीब 14 लाख रुपये की परियोजना तैयार की। इस परियोजना के लिए उन्हें मत्स्य विभाग की ओर से 8 लाख 36 हजार 48 रुपये का अनुदान मिला। इस आर्थिक सहायता से तालाब निर्माण सहित झींगा पालन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित करने में मदद मिली।
तकनीक और उचित प्रबंधन की जानकारी जरूरी
कैलाश का मानना है कि झींगा पालन में केवल पूंजी लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक तकनीक और उचित प्रबंधन की जानकारी भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने मत्स्य विभाग एवं एक्वाकल्चर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, हिसार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें तालाब की तैयारी, पानी की गुणवत्ता का प्रबंधन, स्टॉकिंग घनत्व, रोगों की रोकथाम तथा वैज्ञानिक आहार प्रबंधन जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी को अपनी इकाई में लागू करते हुए कैलाश ने झींगा पालन का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक तरीके से संचालन किया। तालाब की नियमित निगरानी, पानी की गुणवत्ता पर ध्यान और उचित आहार प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाने से उनकी इकाई के संचालन में मदद मिली।
स्थानीय रोजगार को मिल रहा बढ़ावा
मत्स्य किसान कैलाश के प्रयासों और वैज्ञानिक प्रबंधन का परिणाम वित्त वर्ष 2025-26 में देखने को मिला। उनकी झींगा पालन इकाई से एक वर्ष में 8.5 टन झींगा का उत्पादन हुआ। झींगा पालन से उन्हें अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में भी सफलता मिली। इस इकाई में तालाब की देखरेख, झींगा की कटाई तथा अन्य संबंधित कार्यों के लिए 4 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला, जबकि विभिन्न सहायक एवं संबंधित गतिविधियों के माध्यम से 10 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्राप्त हुए। इस प्रकार कैलाश की झींगा पालन इकाई उनके लिए आय का साधन बनने के साथ-साथ आसपास के लोगों के लिए भी आजीविका का माध्यम बनी है।
सरकारी योजनाओं का उठाएं लाभ
कैलाश की सफलता यह दर्शाती है कि उचित तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं के सहयोग से हरियाणा के अंतर्देशीय क्षेत्रों में भी झींगा पालन को वैकल्पिक आय के साधन के रूप में अपनाया जा सकता है। पारंपरिक खेती के साथ मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को जोडक़र किसान अपनी आय के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं। जिला मत्स्य अधिकारी जगदीश चंद्र ने कहा कि कैलाश का अनुभव सिरसा जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणादायक है। उनकी सफलता से यह संदेश मिलता है कि नई तकनीक, वैज्ञानिक प्रबंधन और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर किसान कृषि क्षेत्र में नए अवसर तलाशने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकते हैं।
02 अक्टूबर 2026
लकड़ी के कोल्हू से प्राकृतिक तरीके से निकले तेल ने कमलकांत को दिलाई अलग पहचान
सिरसा, 01 अक्टूबर।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े छोटे उद्यमों को आगे बढऩे के अवसर मिल रहे हैं। इस योजना का लाभ उठाकर मंडी डबवाली निवासी कमल कांत ने ‘ऑर्गेनिक नेचुरल एग्रो’ के नाम से अपना व्यवसाय स्थापित किया और आज लकड़ी के कोल्हू से तैयार किए जा रहे प्राकृतिक तेलों के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई है। कमल कांत ने बताया कि उन्होंने लकड़ी के कोल्हू से कोल्ड प्रेस्ड तेल निकालने का कार्य शुरू किया था। अपने व्यवसाय को विस्तार देने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत वित्तीय सहायता एवं बैंक ऋण का लाभ लिया। उन्हें करीब 12 लाख रुपये की सहायता प्राप्त हुई, जिससे उन्होंने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया और उत्पादन एवं विपणन की सुविधाओं को मजबूत किया।
शुद्ध तेल उत्पादन से मिली रोजगार की राह
‘ऑर्गेनिक नेचुरल एग्रो’ में लकड़ी के कोल्हू से प्राकृतिक तरीके से तेल निकाला जाता है। कमल कांत ने बताया कि इस प्रक्रिया में तेल को अत्यधिक गर्म नहीं किया जाता, जिससे तेल के प्राकृतिक गुणों को बनाए रखने में मदद मिलती है। लकड़ी के कोल्हू से तेल निकालने की पारंपरिक पद्धति के कारण उनके उत्पादों को ग्राहकों द्वारा पसंद किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उनके उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में उनकी इकाई में 8 कर्मचारी कार्यरत हैं। उनके व्यवसाय का वार्षिक कारोबार लगभग 40 लाख रुपये तक पहुंच गया है। इस प्रकार उनका उद्यम स्वयं के लिए आय का साधन बनने के साथ-साथ अन्य लोगों के लिए भी रोजगार का माध्यम बना है।
ऑनलाइन बिक्री से देशभर में पहुंच रहे उत्पाद
कमल कांत के अनुसार, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के अंतर्गत उन्हें वित्तीय सहायता के साथ-साथ उत्पादों की बिक्री एवं विपणन के क्षेत्र में भी सहयोग मिला। आज उनके उत्पादों की बिक्री ऑनलाइन माध्यम से होने के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों एवं प्रमुख शहरों में भी हो रही है। दिल्ली, चंडीगढ़, गुरुग्राम सहित विभिन्न स्थानों पर उनके उत्पाद ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि ऑनलाइन माध्यम से उत्पादों की बिक्री बढऩे के कारण उनके व्यवसाय का बाजार भी लगातार विस्तारित हुआ है। कमल कांत ने सफल व्यवसाय स्थापित करने में सहयोग के लिए सरकार की योजनाओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े उद्यमियों को मिल रहा प्रोत्साहन
सिरसा जिले में प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत डेयरी, बेकरी, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण, खाद्य उत्पादों तथा अन्य खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों से जुड़े उद्यमियों को लाभ दिया जा रहा है। योजना के माध्यम से छोटे उद्यमियों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और विस्तार देने में सहायता मिल रही है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, जिला केंद्र की ओर से युवाओं एवं उद्यमियों से अपील की गई है कि वे प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना का लाभ उठाकर खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अपना व्यवसाय शुरू या विस्तारित कर सकते हैं। योजना के तहत पात्र उद्यमियों को परियोजना लागत का 35 प्रतिशत, अधिकतम 10 लाख रुपये तक की सब्सिडी का प्रावधान है। इच्छुक युवा एवं उद्यमी योजना की जानकारी एवं लाभ प्राप्त करने के लिए जिला सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम केंद्र से संपर्क कर सकते हैं।
01 अक्टूबर 2026
30 सितंबर 2026
एनएसओ जिला में करेगा छह सर्वेक्षण, सही और पूर्ण जानकारी देकर करें सहयोग
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) का क्षेत्र संकार्य प्रभाग (एफओडी) साल 1950 से परिवारों एवं प्रतिष्ठानों से सूचनाएँ एकत्र कर रहा है। इन सूचनाओं का उपयोग राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर योजना निर्माण तथा नीतियों के निर्धारण में किया जाता है। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) अभी कई तरह के घरेलू जैसे -पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे, माइग्रेशन सर्वे, ऑल-इंडिया डेट एंड इन्वेस्टमेंट सर्वे, सिचुएशन असेसमेंट सर्वे और बिज़नेस सर्वे जैसे-कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स, अनइनकॉरपोरेटेड सर्विस एंटरप्राइजेज का सालाना सर्वे, होलसेल प्राइस इंडेक्स, इनकॉरपोरेटेड सर्विस सेक्टर एंटरप्राइजेज का सालाना सर्वे इत्यादि कर रहा है। इन सर्वे में एनएसओ के अधिकारी चुने गए घरों या बिजऩेस से संपर्क करते हैं।
इन सर्वेक्षणों में एकत्र की गई सभी सूचनाएँ पूर्णत: गोपनीय रखी जाती हैं। सर्वेक्षण में भाग लेने वाले परिवारों एवं प्रतिष्ठानों की पहचान किसी भी रिपोर्ट अथवा प्रकाशित आँकड़ों में उजागर नहीं की जाती है। एकत्रित आंकड़ों का उपयोग केवल सांख्यिकीय उद्देश्यों एवं योजना तथा नीतियों निर्माण के लिए किया जाता है। जिला सिरसा में एनएसओ (एफओडी) द्वारा अक्टूबर माह में कई गांवों में सर्वेक्षण किया जाएगा।
निर्धारित कार्यक्रम अनुसार प्रवासन संबंधी विवरण सर्वेक्षण गांव बग्गुवाली तथा सिरसा में, राष्ट्रीय घरेलू आय सर्वेक्षण गांव कोटली तथा मि_ी सुरेरा, एएसयूएसई (गैर-निगमित क्षेत्र के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण) गांव कर्मशाना तथा सिरसा में, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण गांव असीर, भावदीन तथा ऐलनाबाद में, ऋण एवं निवेश संबंधी गांव केशुपुरा, लक्कड़ांवाली ऐलनाबाद तथा सिरसा में, स्थिति आंकलन संबंधी सर्वेक्षण गांव केशुपुरा, लक्कड़ांवाली में होगा। सभी नागरिकों व उद्यमों से अनुरोध है कि वे सर्वेक्षण अधिकारियों को पूरा सहयोग प्रदान करें तथा सही और पूर्ण जानकारी देने के लिए अपना बहुमूल्य समय दें।
29 सितंबर 2026
28 सितंबर 2026
27 सितंबर 2026
26 सितंबर 2026
25 सितंबर 2026
24 सितंबर 2026
23 सितंबर 2026
भूजल संकट की चिंता से शुरू हुई बदलाव की पहल, अब सालाना 8 से 10 लाख पौध तैयार कर रहे मुकेश*
-सिरसा के किसान ने धान-गेहूं की पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर विकसित किया सब्जी नर्सरी उद्यम, नेट हाउस पर मिली 75 प्रतिशत सब्सिडी, अब तक करीब 20 लाख रुपये का अतिरिक्त निवेश
-लगभग 70 व्यावसायिक किसान और 600 से 700 घरेलू बागवानी करने वाले किसान जुड़े, स्थानीय महिलाओं को मिल रहा रोजगार; ग्राफ्टेड पौध उत्पादन और किसान सहकारिता को बढ़ावा देने की योजना
सिरसा, 23 सितंबर।
खेती में बदलाव की शुरुआत कभी आर्थिक जरूरत से होती है तो कभी भविष्य की चुनौतियों को समय रहते पहचानने से। सिरसा जिले के गांव झोरड़नाली निवासी किसान मुकेश कंबोज ने भूजल स्तर में गिरावट, सिंचाई जल की गुणवत्ता में कमी और परंपरागत खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए कृषि के नए विकल्प तलाशने का निर्णय लिया। अक्टूबर 2021 में धान-गेहूं आधारित खेती से आगे बढ़कर सब्जी उत्पादन की शुरुआत करने वाले मुकेश ने धीरे-धीरे गुणवत्तापूर्ण सब्जी पौध नर्सरी को एक कृषि उद्यम के रूप में विकसित किया। आज उनकी नर्सरी में सालाना लगभग 8 से 10 लाख पौधे तैयार किए जा रहे हैं। उनके साथ दूरदराज के लगभग 70 व्यावसायिक किसान और आसपास के गांवों के 600 से 700 किसान घरेलू बागवानी के लिए जुड़े हुए हैं। इस पहल से स्थानीय महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है। मुकेश कंबोज की यह कहानी फसल विविधीकरण, आधुनिक नर्सरी प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण पौध उत्पादन और ग्रामीण कृषि उद्यमिता की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करती है।
भूजल स्तर में गिरावट ने बढ़ाई चिंता
मुकेश कंबोज के अनुसार, उनके आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 फुट तक नीचे चला गया। वे बताते हैं कि धान और गेहूं की खेती में बढ़ती लागत, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और उपजाऊ शक्ति प्रभावित होने जैसी समस्याएं भी किसानों के लिए चिंता का विषय हैं। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने पारंपरिक फसल चक्र से आगे बढ़कर सब्जी उत्पादन और पौध नर्सरी की दिशा में कदम बढ़ाया। उनका उद्देश्य अपनी खेती के लिए नए विकल्प तलाशने के साथ-साथ आसपास के किसानों को भी वैकल्पिक कृषि गतिविधियों से परिचित कराना रहा।
एक-दो एकड़ से शुरू हुआ बदलाव
अक्टूबर 2021 में मुकेश कंबोज ने लगभग एक से दो एकड़ क्षेत्र में विभिन्न सब्जियों की खेती शुरू की। शुरुआती दो वर्षों में उन्होंने अलग-अलग सब्जियों का उत्पादन करके किसानों को इन फसलों की खेती के तरीके दिखाने का प्रयास किया। उनकी इस पहल से धीरे-धीरे कुछ किसान जुड़ने लगे और सब्जी उत्पादन की ओर उनका रुझान बढ़ा। इसी दौरान मुकेश को महसूस हुआ कि सब्जियों की सफल खेती के लिए गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री बेहद महत्वपूर्ण है। किसानों को अच्छी पौध उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उन्होंने प्याज और लहसुन की पौध तैयार करने से नर्सरी गतिविधि शुरू की। बाद में टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च और अन्य सब्जियों की पौध तैयार करना भी शुरू कर दिया।
नेट हाउस पर 75 प्रतिशत सब्सिडी, अतिरिक्त निवेश से विकसित की आधुनिक नर्सरी
नर्सरी को आधुनिक स्वरूप देने के लिए मुकेश कंबोज ने वर्ष 2022 में हरियाणा बागवानी विभाग की संरक्षित खेती संबंधी योजना के तहत नेट हाउस स्थापित किया। उनके अनुसार, नेट हाउस स्थापित करने में उनकी ओर से लगभग 4.25 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि शेष लागत पर विभाग से 75 प्रतिशत सब्सिडी मिली। प्रारंभ में नेट हाउस का उपयोग सब्जी उत्पादन के लिए किया गया, लेकिन बाद में इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसे सब्जी पौध नर्सरी के रूप में विकसित कर लिया गया।
फव्वारा से सिंचाई, 20 लाख का किया अतिरिक्त निवेश
मुकेश बताते हैं कि नर्सरी में फव्वारा यानी माइक्रो स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई, सब्जियों में टपका सिंचाई, विभिन्न उपकरणों और नेट हाउस में आवश्यक बदलाव करने पर अब तक लगभग 20 लाख रुपये का अतिरिक्त निवेश किया जा चुका है। उनकी नर्सरी में प्रो-ट्रे और मिट्टी रहित कोकोपीट मिश्रण का इस्तेमाल करके पौध तैयार की जा रही है। इस व्यवस्था से पौध उत्पादन को अधिक व्यवस्थित बनाने और किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है। मुकेश कंबोज के अनुसार, कई किसान स्वयं पौध तैयार करते समय नुकसान उठा लेते हैं। कुछ किसान दूरदराज के क्षेत्रों से पौध मंगवाते हैं, लेकिन खराब गुणवत्ता की पौध के कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए वे किसानों को पौध उपलब्ध कराने के साथ-साथ सब्जी उत्पादन की तकनीकों और पौध की देखभाल के बारे में भी जानकारी देने का प्रयास करते हैं।
सालाना 15 लाख रुपये तक की आमदनी, मुनाफे के लिए लंबी अवधि की योजना
मुकेश कंबोज के अनुसार, वर्तमान में उनकी नर्सरी से लगभग 15 लाख रुपये तक की वार्षिक आमदनी हुई है। हालांकि, अब तक किए गए निवेश और अन्य खर्चों को देखते हुए शुद्ध आय अभी बहुत कम है। वे इस उद्यम को लंबे समय का निवेश मानते हैं और नर्सरी की गुणवत्ता तथा क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है कि कृषि उद्यम को विकसित करने के लिए शुरुआती दौर में तकनीक, उपकरण और व्यवस्थाओं पर निवेश करना पड़ता है। इसलिए वे नर्सरी के विस्तार और क्षेत्र के अनुकूल पौध तैयार करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।
70 व्यावसायिक किसान और 600 से 700 घरेलू बागवानी करने वाले किसान जुड़े
मुकेश कंबोज की नर्सरी से अब दूरदराज के लगभग 70 किसान व्यावसायिक स्तर पर सब्जी, गेंदे के फूल और हल्दी का उत्पादन करने के लिए जुड़े हुए हैं। इसके अलावा आसपास के गांवों के लगभग 600 से 700 किसान अपने खेतों में घरेलू बागवानी के लिए पौध लेते हैं। उनके अनुसार, सुरतगढ़, रावतसर, नोहर, हनुमानगढ़, संगरिया, ऐलनाबाद, रानियां, चौटाला, खारियां, डबवाली, कालांवाली, बड़ागुढ़ा, बठिंडा और अबोहर सहित विभिन्न क्षेत्रों के किसान उनकी नर्सरी से जुड़े हुए हैं। मुकेश कंबोज के अनुसार, उनके पांच एकड़ के खेत में सीजन की जरूरत के अनुसार एक से दो पुरुष श्रमिकों के साथ पांच से दस महिलाओं को पूरे वर्ष रोजगार मिलता है। सीजन के दौरान श्रमिकों की संख्या और बढ़ जाती है। उनकी पहल से प्रेरित होकर लगभग 20 किसानों ने सब्जी उत्पादन शुरू किया है।
ग्राफ्टिंग तकनीक से क्षेत्र की समस्याओं का समाधान तलाशने की तैयारी
आधुनिक सब्जी उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ते हुए मुकेश कंबोज ने आईसीएआर-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर), वाराणसी से वेजिटेबल ग्राफ्टिंग तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। ग्राफ्टिंग में उपयुक्त रूटस्टॉक और स्कायन को जोड़कर पौधे तैयार किए जाते हैं। सही संयोजन और उचित प्रबंधन के माध्यम से कुछ पौधों में मृदा एवं जड़ संबंधी समस्याओं के प्रति बेहतर सहनशीलता विकसित की जा सकती है। मुकेश के अनुसार, सिरसा और आसपास के राजस्थान तथा पंजाब के क्षेत्रों में मिट्टी, खारा पानी, मिट्टी जनित रोग, गर्म और शुष्क मौसम तथा नेट हाउस में सब्जियों को सूत्रकृमि जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ग्राफ्टेड पौध इन चुनौतियों से निपटने में उपयोगी हो सकती है। मुकेश कंबोज ने वर्ष 2022 में स्थानीय किस्म से छोटे पैमाने पर हल्दी की खेती शुरू की थी। वर्ष 2024 में उन्होंने हल्दी की एक किस्म लगाई, जिसे इस वर्ष लगभग 10 किसानों ने भी उनसे लेकर अपने खेतों में लगाया है। वर्तमान में उनके पास लगभग एक एकड़ में हल्दी की फसल है। सिरसा की गर्मी के प्रति किस्मों की सहनशीलता का आकलन करने के लिए उन्होंने इस वर्ष भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान, कोझिकोड से भी हल्दी की एक किस्म मंगवाकर लगाई है।
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