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Lahoo Ki Lau

युवा दिलों की धड़कन, जन जागृति का दर्पण, निष्पक्ष एवं निर्भिक समाचार पत्र

23 सितंबर 2026

भूजल संकट की चिंता से शुरू हुई बदलाव की पहल, अब सालाना 8 से 10 लाख पौध तैयार कर रहे मुकेश*


-सिरसा के किसान ने धान-गेहूं की पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर विकसित किया सब्जी नर्सरी उद्यम, नेट हाउस पर मिली 75 प्रतिशत सब्सिडी, अब तक करीब 20 लाख रुपये का अतिरिक्त निवेश

-लगभग 70 व्यावसायिक किसान और 600 से 700 घरेलू बागवानी करने वाले किसान जुड़े, स्थानीय महिलाओं को मिल रहा रोजगार; ग्राफ्टेड पौध उत्पादन और किसान सहकारिता को बढ़ावा देने की योजना

सिरसा, 23 सितंबर।
 खेती में बदलाव की शुरुआत कभी आर्थिक जरूरत से होती है तो कभी भविष्य की चुनौतियों को समय रहते पहचानने से। सिरसा जिले के गांव झोरड़नाली निवासी किसान मुकेश कंबोज ने भूजल स्तर में गिरावट, सिंचाई जल की गुणवत्ता में कमी और परंपरागत खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए कृषि के नए विकल्प तलाशने का निर्णय लिया। अक्टूबर 2021 में धान-गेहूं आधारित खेती से आगे बढ़कर सब्जी उत्पादन की शुरुआत करने वाले मुकेश ने धीरे-धीरे गुणवत्तापूर्ण सब्जी पौध नर्सरी को एक कृषि उद्यम के रूप में विकसित किया। आज उनकी नर्सरी में सालाना लगभग 8 से 10 लाख पौधे तैयार किए जा रहे हैं। उनके साथ दूरदराज के लगभग 70 व्यावसायिक किसान और आसपास के गांवों के 600 से 700 किसान घरेलू बागवानी के लिए जुड़े हुए हैं। इस पहल से स्थानीय महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है। मुकेश कंबोज की यह कहानी फसल विविधीकरण, आधुनिक नर्सरी प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण पौध उत्पादन और ग्रामीण कृषि उद्यमिता की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

भूजल स्तर में गिरावट ने बढ़ाई चिंता
मुकेश कंबोज के अनुसार, उनके आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर कई स्थानों पर 120 से 180 फुट तक नीचे चला गया। वे बताते हैं कि धान और गेहूं की खेती में बढ़ती लागत, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और उपजाऊ शक्ति प्रभावित होने जैसी समस्याएं भी किसानों के लिए चिंता का विषय हैं। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने पारंपरिक फसल चक्र से आगे बढ़कर सब्जी उत्पादन और पौध नर्सरी की दिशा में कदम बढ़ाया। उनका उद्देश्य अपनी खेती के लिए नए विकल्प तलाशने के साथ-साथ आसपास के किसानों को भी वैकल्पिक कृषि गतिविधियों से परिचित कराना रहा।

एक-दो एकड़ से शुरू हुआ बदलाव
अक्टूबर 2021 में मुकेश कंबोज ने लगभग एक से दो एकड़ क्षेत्र में विभिन्न सब्जियों की खेती शुरू की। शुरुआती दो वर्षों में उन्होंने अलग-अलग सब्जियों का उत्पादन करके किसानों को इन फसलों की खेती के तरीके दिखाने का प्रयास किया। उनकी इस पहल से धीरे-धीरे कुछ किसान जुड़ने लगे और सब्जी उत्पादन की ओर उनका रुझान बढ़ा। इसी दौरान मुकेश को महसूस हुआ कि सब्जियों की सफल खेती के लिए गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री बेहद महत्वपूर्ण है। किसानों को अच्छी पौध उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उन्होंने प्याज और लहसुन की पौध तैयार करने से नर्सरी गतिविधि शुरू की। बाद में टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च और अन्य सब्जियों की पौध तैयार करना भी शुरू कर दिया।

नेट हाउस पर 75 प्रतिशत सब्सिडी, अतिरिक्त निवेश से विकसित की आधुनिक नर्सरी
नर्सरी को आधुनिक स्वरूप देने के लिए मुकेश कंबोज ने वर्ष 2022 में हरियाणा बागवानी विभाग की संरक्षित खेती संबंधी योजना के तहत नेट हाउस स्थापित किया। उनके अनुसार, नेट हाउस स्थापित करने में उनकी ओर से लगभग 4.25 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि शेष लागत पर विभाग से 75 प्रतिशत सब्सिडी मिली। प्रारंभ में नेट हाउस का उपयोग सब्जी उत्पादन के लिए किया गया, लेकिन बाद में इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसे सब्जी पौध नर्सरी के रूप में विकसित कर लिया गया।

फव्वारा से सिंचाई, 20 लाख का किया अतिरिक्त निवेश
मुकेश बताते हैं कि नर्सरी में फव्वारा यानी माइक्रो स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई, सब्जियों में टपका सिंचाई, विभिन्न उपकरणों और नेट हाउस में आवश्यक बदलाव करने पर अब तक लगभग 20 लाख रुपये का अतिरिक्त निवेश किया जा चुका है। उनकी नर्सरी में प्रो-ट्रे और मिट्टी रहित कोकोपीट मिश्रण का इस्तेमाल करके पौध तैयार की जा रही है। इस व्यवस्था से पौध उत्पादन को अधिक व्यवस्थित बनाने और किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है। मुकेश कंबोज के अनुसार, कई किसान स्वयं पौध तैयार करते समय नुकसान उठा लेते हैं। कुछ किसान दूरदराज के क्षेत्रों से पौध मंगवाते हैं, लेकिन खराब गुणवत्ता की पौध के कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए वे किसानों को पौध उपलब्ध कराने के साथ-साथ सब्जी उत्पादन की तकनीकों और पौध की देखभाल के बारे में भी जानकारी देने का प्रयास करते हैं। 

सालाना 15 लाख रुपये तक की आमदनी, मुनाफे के लिए लंबी अवधि की योजना
मुकेश कंबोज के अनुसार, वर्तमान में उनकी नर्सरी से लगभग 15 लाख रुपये तक की वार्षिक आमदनी हुई है। हालांकि, अब तक किए गए निवेश और अन्य खर्चों को देखते हुए शुद्ध आय अभी बहुत कम है। वे इस उद्यम को लंबे समय का निवेश मानते हैं और नर्सरी की गुणवत्ता तथा क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है कि कृषि उद्यम को विकसित करने के लिए शुरुआती दौर में तकनीक, उपकरण और व्यवस्थाओं पर निवेश करना पड़ता है। इसलिए वे नर्सरी के विस्तार और क्षेत्र के अनुकूल पौध तैयार करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

70 व्यावसायिक किसान और 600 से 700 घरेलू बागवानी करने वाले किसान जुड़े
मुकेश कंबोज की नर्सरी से अब दूरदराज के लगभग 70 किसान व्यावसायिक स्तर पर सब्जी, गेंदे के फूल और हल्दी का उत्पादन करने के लिए जुड़े हुए हैं। इसके अलावा आसपास के गांवों के लगभग 600 से 700 किसान अपने खेतों में घरेलू बागवानी के लिए पौध लेते हैं। उनके अनुसार, सुरतगढ़, रावतसर, नोहर, हनुमानगढ़, संगरिया, ऐलनाबाद, रानियां, चौटाला, खारियां, डबवाली, कालांवाली, बड़ागुढ़ा, बठिंडा और अबोहर सहित विभिन्न क्षेत्रों के किसान उनकी नर्सरी से जुड़े हुए हैं। मुकेश कंबोज के अनुसार, उनके पांच एकड़ के खेत में सीजन की जरूरत के अनुसार एक से दो पुरुष श्रमिकों के साथ पांच से दस महिलाओं को पूरे वर्ष रोजगार मिलता है। सीजन के दौरान श्रमिकों की संख्या और बढ़ जाती है। उनकी पहल से प्रेरित होकर लगभग 20 किसानों ने सब्जी उत्पादन शुरू किया है। 


ग्राफ्टिंग तकनीक से क्षेत्र की समस्याओं का समाधान तलाशने की तैयारी
आधुनिक सब्जी उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ते हुए मुकेश कंबोज ने आईसीएआर-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर), वाराणसी से वेजिटेबल ग्राफ्टिंग तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। ग्राफ्टिंग में उपयुक्त रूटस्टॉक और स्कायन को जोड़कर पौधे तैयार किए जाते हैं। सही संयोजन और उचित प्रबंधन के माध्यम से कुछ पौधों में मृदा एवं जड़ संबंधी समस्याओं के प्रति बेहतर सहनशीलता विकसित की जा सकती है। मुकेश के अनुसार, सिरसा और आसपास के राजस्थान तथा पंजाब के क्षेत्रों में मिट्टी, खारा पानी, मिट्टी जनित रोग, गर्म और शुष्क मौसम तथा नेट हाउस में सब्जियों को सूत्रकृमि जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ग्राफ्टेड पौध इन चुनौतियों से निपटने में उपयोगी हो सकती है। मुकेश कंबोज ने वर्ष 2022 में स्थानीय किस्म से छोटे पैमाने पर हल्दी की खेती शुरू की थी। वर्ष 2024 में उन्होंने हल्दी की एक किस्म लगाई, जिसे इस वर्ष लगभग 10 किसानों ने भी उनसे लेकर अपने खेतों में लगाया है। वर्तमान में उनके पास लगभग एक एकड़ में हल्दी की फसल है। सिरसा की गर्मी के प्रति किस्मों की सहनशीलता का आकलन करने के लिए उन्होंने इस वर्ष भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान, कोझिकोड से भी हल्दी की एक किस्म मंगवाकर लगाई है।

23 Sep. 2026





 

22 सितंबर 2026

स्वयं सहायता समूह से जुडकऱ शारदा की बदली जिंदगी, अब खुद बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

- सिलाई से पशुपालन तक बढ़ाया रोजगार, आज 20 से 25 हजार रुपये प्रतिमाह की आय

सिरसा, 22 सितंबर।
सिरसा जिले के गांव जमाल की रहने वाली शारदा ने स्वयं सहायता समूह से जुडकऱ न केवल अपने जीवन में बदलाव लाया,  बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। वर्ष 2019 में शारदा ‘बालाजी महिला स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ी। समूह से जुडऩे से पहले उनके पास अपनी आय का कोई साधन नहीं था। आज वह अपने पैरों पर खड़ी हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
शारदा ने बताया कि जब वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं, तब उनके पास अपना रोजगार शुरू करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे। समूह के माध्यम से उन्हें शुरुआती सहयोग के तौर पर 10,000 रुपये का ऋण मिला। इस आर्थिक सहयोग ने उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा किया और उन्होंने अपना रोजगार शुरू करने का निर्णय लिया।
समूह से जुडऩे के बाद शारदा ने सिलाई का काम शुरू किया। वर्ष 2021 में उन्होंने लगभग 50,000 रुपये की पूंजी लगाकर मनिहारी की दुकान भी शुरू की। इसके साथ ही उन्होंने धीरे-धीरे अपने रोजगार का विस्तार किया। समूह से उन्हें 1,00,000 रुपये का ऋण प्राप्त हुआ, जिसका उपयोग उन्होंने मनिहारी की दुकान और सिलाई कार्य को आगे बढ़ाने के लिए किया। इसके अलावा बैंक ऋण लेकर उन्होंने भैंस खरीदकर पशुपालन का कार्य भी शुरू किया।
शारदा ने सिलाई के कार्य में भी विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। उन्होंने भेड-बकरी पालन का प्रशिक्षण लिया तथा ब्यूटी पार्लर का कार्य भी सीखा, जिससे उन्हें अपनी आय के अतिरिक्त साधन विकसित करने में मदद मिली। उनके द्वारा किए जा रहे विभिन्न कार्यों से आज वह लगभग 20,000 से 25,000 रुपये प्रतिमाह की आय अर्जित कर रही हैं।
शारदा की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत आर्थिक मजबूती तक सीमित नहीं है। वह अपने स्वयं सहायता समूह, ग्राम संगठन तथा सीआरपी टीम से भी जुड़ी हुई हैं और समूह की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार तथा आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित करती हैं। उनका कहना है कि समूह के माध्यम से उन्हें आर्थिक सहयोग के साथ-साथ आगे बढऩे का आत्मविश्वास और नई दिशा मिली।
शारदा की कहानी यह दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग मिलने पर ग्रामीण महिलाएं अपने हुनर को रोजगार में बदलकर परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती हैं। स्वयं सहायता समूह से जुडकऱ शारदा ने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आत्मनिर्भरता, नेतृत्व और सम्मान की नई पहचान बनाई है। उनकी सफलता ग्रामीण क्षेत्र की अन्य महिलाओं के लिए भी स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढऩे की प्रेरणा बन रही है।

22 Sep. 2026