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Lahoo Ki Lau

युवा दिलों की धड़कन, जन जागृति का दर्पण, निष्पक्ष एवं निर्भिक समाचार पत्र

13 अक्टूबर 2026

पराली से पैलेट्स बनाकर सालाना 7 से 8 करोड़ रुपये का कारोबार कर रहीं संजना व सोनिका

- ढाई करोड़ रुपये की लागत से वर्ष 2024 में स्थापित की फैक्ट्री, 20 से अधिक लोगों को मिला रोजगार

सिरसा, 13 अक्टूबर।

खेतों में फसल अवशेष जलने से उठने वाला धुआं कभी पर्यावरण और आमजन के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनता था, लेकिन अब यही पराली रोजगार और कमाई का जरिया बन रही है। सिरसा जिले के गांव घोड़ावाली निवासी संजना व सोनिका ने पराली की समस्या का समाधान तलाशते हुए वर्ष 2024 में फैक्ट्री स्थापित की। यहां धान की पराली से पैलेट्स तैयार किए जाते हैं, जिन्हें बिजली संयंत्रों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। करीब ढाई करोड़ रुपये की लागत से स्थापित इस परियोजना को कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) योजना के माध्यम से पूरा किया गया। आज इस फैक्ट्री का सालाना कारोबार 7 से 8 करोड़ रुपये तक है। दो महिला साझेदार मिलकर इस इकाई का संचालन कर रही हैं।

सालाना डेढ़ लाख क्विंटल तक पराली की खपत

फैक्ट्री में पैलेट्स तैयार करने के लिए सिरसा और आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले बेलर संचालकों से पराली खरीदी जाती है। इस इकाई में हर साल करीब एक से डेढ़ लाख क्विंटल पराली की खपत होती है। धान की कटाई के सीजन में एकत्र की गई पराली का भंडारण करके उससे पूरे साल उत्पादन जारी रखा जाता है। इससे फसल अवशेष का उपयोगी उत्पाद तैयार होता है और पराली के प्रबंधन के लिए एक व्यावहारिक विकल्प भी मिलता है। फैक्ट्री में तैयार पैलेट्स बिजली संयंत्रों द्वारा खरीदे जाते हैं, जिससे उत्पाद के लिए बाजार उपलब्ध है।
20 से अधिक लोगों को मिला रोजगार
पराली से पैलेट्स बनाने वाली इस फैक्ट्री ने कारोबार के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं। यहां 20 से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यह पहल बताती है कि कृषि अवशेषों का उचित प्रबंधन केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है। पराली को खेतों में जलाने के बजाय उपयोगी उत्पाद में बदलने से किसानों, बेलर संचालकों और उद्योगों के बीच आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
धुएं की परेशानी से निकला समाधान का रास्ता
सोनिका ने बताया कि कुछ साल पहले धान की कटाई के बाद आसमान में चारों तरफ धुआं दिखाई देता था। पराली जलाने से होने वाली परेशानी को देखते हुए उन्होंने इसके समाधान की दिशा में प्रयास शुरू किए। उनका उद्देश्य पराली का ऐसा उपयोग तलाशना था, जिससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के साथ आर्थिक लाभ भी हासिल किया जा सके। उन्होंने कहा कि वे पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी तरफ से जितना योगदान दे सकती हैं, उतना देने का प्रयास कर रही हैं। सोनिका के अनुसार, सरकार की नीतियों और पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने के प्रयासों से स्थिति में बदलाव आया है।

जिला की मंडियों में 10577 मीट्रिक टन धान की खरीद


सिरसा, 13 अक्टूबर।
जिला की विभिन्न मंडियों में खरीद एजेंसियों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 10577 मीट्रिक टन (एमटी) धान की खरीद की जा चुकी है। गत दिवस तक कुल आवक में से खाद्य एवं आपूर्ति विभाग द्वारा 5345 एमटी, हैफेड द्वारा 3969 एमटी तथा हरियाणा स्टेट वेयरहाउसिंग कारपोरेशन द्वारा 1263 एमटी खरीद की गई है। इसके साथ-साथ उठान प्रक्रिया भी तेजी से जारी है।
जिला खाद्य एवं आपूर्ति नियंत्रक हरवीर सिंह ने बताया कि डबवाली अनाजमंडी में 1648 एमटी, देसूजोधा मंडी में 847 एमटी, ऐलनाबाद मंडी में 900 एमटी, कालांवाली में 1786 एमटी, रानियां में 860 एमटी, रोड़ी मंडी में 1157 एमटी धान की खरीद दर्ज की गई, साथ ही जिला की अन्य मंडियों में भी धान की आवक जारी है। उन्होंने किसानों से अपील की कि धान को सुखाकर मंडी में लेकर आए, ताकि जल्द खरीद की जा सके।

13 Oct. 2026





 

09 अक्टूबर 2026

9 Oct. 2026





 

पीएम-कुसुम योजना से किसान यशवीर की खेती की लागत हुई कम

-सोलर पंप से सिंचाई हुई किफायती, डीजल के खर्च से मिली बड़ी राहत

सिरसा, 08 अक्टूबर।
प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) योजना किसानों के लिए सिंचाई की लागत कम करने और सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। योजना के तहत किसानों को सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई पंप उपलब्ध करवाए जा रहे हैं, जिससे उन्हें डीजल और बिजली पर होने वाले खर्च से राहत मिल रही है। सिरसा के गांव लुदेसर के किसान यशवीर गाट के लिए भी यह योजना खेती को अधिक किफायती बनाने का माध्यम बनी है। 43 वर्षीय यशवीर गाट बीए और जेबीटी पास हैं तथा उनके पास पांच एकड़ जमीन है। वर्ष 2023 में उनके खेत में 10 एचपी की सोलर मोटर लगाई गई। इससे पहले वह खेतों की सिंचाई के लिए डीजल इंजन और जनरेटर पर निर्भर थे। सौर ऊर्जा आधारित पंप लगने के बाद उनके लिए सिंचाई का तरीका आसान होने के साथ-साथ खर्च भी काफी कम हुआ है।
डीजल खर्च से मिली राहत, सौर ऊर्जा ने बदली सिंचाई की तस्वीर
यशवीर गाट बताते हैं कि सोलर कनेक्शन मिलने से पहले खेतों की सिंचाई के लिए डीजल इंजन और जनरेटर का इस्तेमाल करना पड़ता था। एक घंटे में करीब 10 लीटर डीजल खर्च हो जाता था। इसके अलावा डीजल इंजन की सर्विस और रख-रखाव पर होने वाला खर्च अलग था। उन्होंने बताया कि हर बार सिंचाई से पहले डीजल की व्यवस्था करने और जनरेटर के रख-रखाव को लेकर चिंता रहती थी। वर्ष 2023 में खेत में 10 एचपी की सोलर मोटर लगने के बाद यशवीर गाट की सिंचाई व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। अब वह सौर ऊर्जा की मदद से एक दिन में करीब दो एकड़ जमीन की सिंचाई कर लेते हैं। उन्हें डीजल खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और जनरेटर चलाने से जुड़े खर्च से भी राहत मिली है।
जरूरत के अनुसार सिंचाई करना भी आसान
यशवीर गाट के अनुसार, पहले सिंचाई खेती की लागत बढ़ाने वाला एक बड़ा खर्च था, लेकिन सोलर पंप लगने के बाद यह खर्च काफी कम हो गया है। दिन के समय सौर ऊर्जा उपलब्ध होने से खेत की जरूरत के अनुसार सिंचाई करना भी आसान हुआ है। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए सरकार की यह योजना लाभदायक बन रही है और खेती के खर्चों को कम करने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण में भी लाभ पहुंचा रही है। सोलर पंप का रखरखाव का खर्च नहीं है। यह लंबी अवधि की बचत का हिस्सा है।
- योजना ने किसानों के किए ठाठ, 35500 किसानों को हुआ लाभ
यह अकेले लुदेसर के किसान की कहानी नहीं है बल्कि जिले में 35,500 ऐसे किसान है जिन्होंने इस योजना के तहत 2019 से लेकर अबतक लाभ लिया है। किसानों के ठाठ करने वाली यह योजना वर्ष 2019 में शुरू की गई थी और लगातार किसान योजना से जुड़ रहे हैं।

08 अक्टूबर 2026

8 Oct. 2026





 

हरियाणा की एग्री-बिजनेस नीति से चमकी ‘दीपम इंडस्ट्रीज’

- छोटे से व्यवसाय से 50 करोड़ के टर्नओवर तक का सफर

सिरसा, 07 अक्टूबर।
हरियाणा सरकार की ‘एग्री-बिजनेस एंड फूड प्रोसेसिंग पॉलिसी’ प्रदेश के सूक्ष्म एवं लघु उद्यमियों के लिए आर्थिक विकास और विस्तार का प्रभावी माध्यम बन रही है। सरकारी नीतियों के तहत मिलने
वाले प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता का लाभ उठाकर सिरसा की दीपम इंडस्ट्रीज ने छोटे स्तर से शुरुआत कर सफलता की नई मिसाल कायम की है। कंपनी के प्रोप्राइटर केवल कृष्ण बाथला ने वर्ष 1993 में टॉफी और कैंडी बनाने की एक छोटी इकाई से अपना कारोबार शुरू किया था। निरंतर मेहनत, आधुनिक तकनीक और नीतिगत सहयोग के बल पर यह व्यवसाय वर्ष 2023 में प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में विकसित हुआ।

4.5 करोड़ का नया निवेश और एक करोड़ तक की सब्सिडी
प्रोप्राइटर केवल कृष्ण बाथला के अनुसार, राज्य सरकार की खाद्य प्रसंस्करण प्रोत्साहन नीति का लाभ लेते हुए इकाई के विस्तार के लिए 4.5 करोड़ का नया निवेश किया गया। नीति के तहत फिक्स्ड कैपिटल इन्वेस्टमेंट पर 25 प्रतिशत पूंजीगत निवेश सब्सिडी का प्रावधान है, जिसकी अधिकतम सीमा एक करोड़ तक है। नीतिगत सहयोग, वित्तीय प्रोत्साहन और आधुनिक तकनीक के उपयोग से दीपम इंडस्ट्रीज ने कारोबार का लगातार विस्तार किया और आज कंपनी करीब 50 करोड़ के वार्षिक टर्नओवर तक पहुंच चुकी है।
55 लोगों को मिला रोजगार, 20 स्थानीय महिलाएं भी शामिल
दीपम इंडस्ट्रीज की सफलता केवल कारोबार के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं। वर्तमान में कंपनी में 55 लोगों को स्थायी रोजगार मिला हुआ है। इनमें 20 स्थानीय महिला कार्यकर्ता शामिल हैं। इस प्रकार उद्योग के विस्तार से स्थानीय युवाओं के साथ-साथ महिलाओं को भी रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर प्राप्त हुए हैं।
कन्फेक्शनरी और मिठाइयों से लेकर स्नैक्स तक, देशभर में पहुंच
दीपम इंडस्ट्रीज द्वारा विभिन्न प्रकार के कन्फेक्शनरी उत्पाद, शीतल पेय, पारंपरिक मिठाइयां तथा नमकीन और स्नैक्स तैयार किए जा रहे हैं। कंपनी ने स्थानीय बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनाने के साथ-साथ अपने उत्पादों की पहुंच देश के विभिन्न हिस्सों तक बनाई है। आज दीपम इंडस्ट्रीज के उत्पादों की आपूर्ति पूरे भारत में की जा रही है।
सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर युवा बन सकते हैं आत्मनिर्भर
जिला एमएसएमई केंद्र के उप निदेशक दिनेश कुमार ने बताया कि सिरसा जिले में खाद्य प्रसंस्करण एवं पेय निर्माण क्षेत्र में करीब 300 से अधिक पंजीकृत इकाइयां स्थापित हैं। इनमें मसाले, जूस, पशु आहार, राइस मिल, दाल मिल और बेकरी उत्पादों सहित विभिन्न प्रकार की खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां शामिल हैं। ये इकाइयां स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन के साथ-साथ जिले की औद्योगिक एवं आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने बताया कि प्रदेश में नए उद्यम शुरू करने तथा मौजूदा इकाइयों के विस्तार के लिए विभिन्न प्रोत्साहन एवं सहायता योजनाएं उपलब्ध हैं। दीपम इंडस्ट्रीज की सफलता यह दर्शाती है कि उचित योजना, मेहनत, आधुनिक तकनीक और सरकारी नीतियों का लाभ लेकर छोटे स्तर से शुरू किया गया व्यवसाय भी बड़े उद्योग का रूप ले सकता है। इच्छुक युवा और उद्यमी इन योजनाओं की जानकारी के लिए आधिकारिक पोर्टल अथवा जिला एमएसएमई केंद्र से संपर्क कर लाभ उठा सकते हैं और प्रदेश की आर्थिक प्रगति में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।

04 अक्टूबर 2026

4 Oct. 2026





 

5 एकड़ में 62 किस्म की सब्जियां उगाकर मत्तड़ के किसान ने बदली खेती की तस्वीर

धान-गेहूं से हटकर अपनाई विविध खेती, विदेशी सब्जियों से बढ़ी आमदनी और घटा पानी का खर्च




सिरसा, 03 अक्टूबर।
खेती में प्रयोग और बाजार की मांग की समझ हो तो छोटी जोत भी बेहतर आमदनी का आधार बन सकती है। गांव मत्तड़ के प्रगतिशील किसान गुरप्रीत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह ने पांच एकड़ में एक साथ अलग-अलग मौसम की करीब 62 किस्म की सब्जियां उगाकर इसका उदाहरण प्रस्तुत किया है। परंपरागत धान-गेहूं की खेती से हटकर उन्होंने बागवानी आधारित विविध खेती को अपनाया और खेत को पूरे वर्ष उत्पादन देने वाली इकाई में बदल दिया। अब वे विदेशी एवं विशेष किस्म की सब्जियों की खेती कर रहे हैं और अपनी उपज चंडीगढ़, दिल्ली व लुधियाना की सब्जी मंडियों तक पहुंचा रहे हैं। किसान के अनुसार उन्हें सालाना प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये से अधिक की बचत हो रही है। गुरप्रीत सिंह ने अपनी पांच एकड़ जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग सब्जियों की खेती शुरू की। उनके खेत में लीक, सेलेरी, चेरी टमाटर, रंग-बिरंगी गोभी, घेरकिन खीरा और रंगीन शिमला मिर्च जैसी सब्जियां उगाई जा रही हैं। अलग-अलग फसलों की बुवाई और तुड़ाई का समय अलग होने से खेत में पूरे साल उत्पादन का सिलसिला बना रहता है।


15 से 20 दिन के अंतराल पर नई बुवाई
किसान के अनुसार एक ही समय पर पूरी जमीन में एक फसल लगाने के बजाय वे चरणबद्ध तरीके से खेती करते हैं। करीब 15 से 20 दिन के अंतराल पर नई बुवाई करने से अलग-अलग समय पर फसल तैयार होती रहती है। इससे बाजार में लगातार सब्जी भेजने का अवसर मिलता है और किसी एक फसल पर निर्भरता भी कम होती है। गुरप्रीत सिंह ने बताया कि विदेशी और विशेष किस्म की सब्जियों की मांग सामान्य सब्जियों से अलग बाजार में है। उनके अनुसार चेरी टमाटर को होटल और कंपनियों तक पहुंचाने पर बेहतर भाव मिलता है। रंगीन गोभी और घेरकिन खीरे की भी विशेष मांग रहती है। उनका कहना है कि फसल लगाने से पहले बाजार तलाशना और खरीदार से संपर्क करना इस खेती में बेहद जरूरी है।

पांच एकड़ से 10 से 12 लाख रुपये शुद्ध आमदनी का दावा
गुरप्रीत सिंह के अनुसार पहले पांच एकड़ में धान-गेहूं की खेती से सालभर में करीब दो से ढाई लाख रुपये की बचत होती थी। विविध सब्जी उत्पादन अपनाने के बाद उनका दावा है कि सभी खर्च निकालने के पश्चात 10 से 12 लाख रुपये सालाना शुद्ध मुनाफा हो रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इस खेती में पानी की खपत परंपरागत खेती की तुलना में करीब 70 प्रतिशत तक कम हुई है।


पहले बाजार, फिर बीज का करें चयन
किसान गुरप्रीत सिंह का कहना है कि नई तरह की खेती शुरू करने वाले किसानों को एकदम बड़े स्तर पर जोखिम लेने के बजाय पहले एक कनाल या छोटे क्षेत्र में प्रयोग करना चाहिए। बाजार में किस सब्जी की मांग है, खरीदार कौन है और किस समय बेहतर भाव मिल सकता है, इसकी जानकारी लेने के बाद ही बीज और फसल का चयन करना चाहिए। उनके अनुसार कंपनियों, होटलों और सीधे खरीदारों से संपर्क होने पर किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार मिल सकता है। मत्तड़ के इस किसान का प्रयोग यह संदेश देता है कि खेती में फसल विविधीकरण, बाजार की समझ और चरणबद्ध उत्पादन को अपनाकर छोटी जोत को भी सालभर आय देने वाले मॉडल में बदला जा सकता है।

03 अक्टूबर 2026

3 Oct. 2026





 

पारंपरिक खेती से हटकर झींगा पालन ने बदली कैलाश की राह

- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत आठ लाख के सहयोग से शुरू किया झींगा पालन

- 8.5 टन वार्षिक उत्पादन के साथ 14 लोगों को मिला रोजगार
सिरसा, 02 अक्टूबर।
जिले के गांव कर्मसाना की महिला किसान कैलाश ने पारंपरिक कृषि फसलों से हटकर झींगा पालन को अपनाकर अपनी आय का नया और वैकल्पिक साधन विकसित किया है। वर्ष 2022 में मत्स्य विभाग के मार्गदर्शन एवं सहयोग से उन्होंने झींगा पालन की शुरुआत की। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मिली वित्तीय सहायता और तकनीकी प्रशिक्षण ने उनके इस प्रयास को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कैलाश ने झींगा पालन इकाई स्थापित करने के लिए करीब 14 लाख रुपये की परियोजना तैयार की। इस परियोजना के लिए उन्हें मत्स्य विभाग की ओर से 8 लाख 36 हजार 48 रुपये का अनुदान मिला। इस आर्थिक सहायता से तालाब निर्माण सहित झींगा पालन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित करने में मदद मिली।
तकनीक और उचित प्रबंधन की जानकारी जरूरी
कैलाश का मानना है कि झींगा पालन में केवल पूंजी लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक तकनीक और उचित प्रबंधन की जानकारी भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने मत्स्य विभाग एवं एक्वाकल्चर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, हिसार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें तालाब की तैयारी, पानी की गुणवत्ता का प्रबंधन, स्टॉकिंग घनत्व, रोगों की रोकथाम तथा वैज्ञानिक आहार प्रबंधन जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी को अपनी इकाई में लागू करते हुए कैलाश ने झींगा पालन का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक तरीके से संचालन किया। तालाब की नियमित निगरानी, पानी की गुणवत्ता पर ध्यान और उचित आहार प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाने से उनकी इकाई के संचालन में मदद मिली।
स्थानीय रोजगार को मिल रहा बढ़ावा
मत्स्य किसान कैलाश के प्रयासों और वैज्ञानिक प्रबंधन का परिणाम वित्त वर्ष 2025-26 में देखने को मिला। उनकी झींगा पालन इकाई से एक वर्ष में 8.5 टन झींगा का उत्पादन हुआ। झींगा पालन से उन्हें अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में भी सफलता मिली। इस इकाई में तालाब की देखरेख, झींगा की कटाई तथा अन्य संबंधित कार्यों के लिए 4 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला, जबकि विभिन्न सहायक एवं संबंधित गतिविधियों के माध्यम से 10 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्राप्त हुए। इस प्रकार कैलाश की झींगा पालन इकाई उनके लिए आय का साधन बनने के साथ-साथ आसपास के लोगों के लिए भी आजीविका का माध्यम बनी है।
सरकारी योजनाओं का उठाएं लाभ
कैलाश की सफलता यह दर्शाती है कि उचित तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं के सहयोग से हरियाणा के अंतर्देशीय क्षेत्रों में भी झींगा पालन को वैकल्पिक आय के साधन के रूप में अपनाया जा सकता है। पारंपरिक खेती के साथ मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को जोडक़र किसान अपनी आय के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं। जिला मत्स्य अधिकारी जगदीश चंद्र ने कहा कि कैलाश का अनुभव सिरसा जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणादायक है। उनकी सफलता से यह संदेश मिलता है कि नई तकनीक, वैज्ञानिक प्रबंधन और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर किसान कृषि क्षेत्र में नए अवसर तलाशने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकते हैं।